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🖊 तेजाराम लाडणवा मेड़ता सिटी
मीरा नगरी मेड़ता की गलियों में एक दौर ऐसा भी था, जब गांच्छा बाजार में गूंजने वाली “धूं-धूं” की आवाज लोगों के लिए सर्दी और बरसात से राहत का संदेश लेकर आती थी। यह आवाज थी उस पिदन मशीन की, जिसे चलाते थे टोंक जिले के मालपुरा-दिग्गी क्षेत्र से आए मेहनतकश कारीगर अब्दुल रहमान पठान। समय बदला, मशीनें बदलीं, लेकिन उस आवाज से शुरू हुई मेहनत और भरोसे की विरासत आज भी जिंदा है। उस विरासत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं उनके पुत्र अब्दुल इस्लाम पठान।
अब्दुल रहमान पठान जब पहली बार मेड़ता आए, तब उनके पास न कोई बड़ी दुकान थी और न ही कोई बड़ा कारोबार। साइकिल पर पिंजरा और पिदन मशीन के सहारे उन्होंने लोगों के लिए रजाई, गद्दे और प्रसिद्ध “गुगी” तैयार करनी शुरू की। उस समय गुगी सिर्फ एक वस्त्र नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। बरसात में वही छाता बन जाती थी और सर्दियों में वही कंबल। पशुपालक, किसान और जंगलों में रहने वाले लोग इसे सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल करते थे।
धीरे-धीरे अब्दुल रहमान की ईमानदारी और काम की गुणवत्ता ने उन्हें मेड़ता के लोगों के दिलों में जगह दिला दी। लोग 50-50 किलोमीटर दूर से ऊन लेकर मेड़ता आते और उनके हाथों से बनी गुगी बनवाकर ले जाते। गांच्छा बाजार की वह छोटी-सी दुकान देखते ही देखते विश्वास का केंद्र बन गई।
पिता की मेहनत, बेटे की पहचान
अब्दुल रहमान के परिवार में पांच पुत्र और तीन पुत्रियां हैं, लेकिन चौथे नंबर के पुत्र अब्दुल इस्लाम पठान ने पिता की मेहनत और सामाजिक प्रतिष्ठा को नई पहचान दी। वर्ष 1992 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
भाजपा में संगठनात्मक क्षमता और जनसंपर्क के दम पर इस्लाम पठान ने अपनी अलग पहचान बनाई। वे भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा में प्रदेश मंत्री रहे, कई बार जिला अध्यक्ष बने और वर्तमान में भी संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर उन्होंने हर वर्ग के लोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाई है।
मेड़ता में कोई सामाजिक, धार्मिक या सार्वजनिक कार्यक्रम हो और इस्लाम पठान की उपस्थिति न हो, ऐसा कम ही देखने को मिलता है। यही कारण है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समाजों में उन्हें समान सम्मान प्राप्त है।
पिदन से आधुनिक कारोबार तक
समय के साथ हाथ से चलने वाली पिदन मशीन इतिहास का हिस्सा बन गई, लेकिन कारोबार नहीं रुका। आज इस्लाम पठान आधुनिक मशीनों के माध्यम से रजाई, गद्दे, तकिए और अन्य बिस्तर सामग्री का बड़ा कारोबार संचालित कर रहे हैं। मेड़ता में उनके बड़े गोदाम और प्रतिष्ठान हैं, जहां से तैयार माल आसपास के शहरों और कस्बों तक सप्लाई किया जाता है।
सबसे खास बात यह है कि आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद परिवार आज भी श्रम को सम्मान देता है। इस्लाम पठान स्वयं कारोबार की निगरानी करते हैं और परिवार के सदस्य भी काम में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। उनके प्रतिष्ठान पर कई मजदूरों को भी रोजगार मिला हुआ है।
समाज की हर संस्था में सक्रिय भूमिका
मेड़ता के मुस्लिम समाज की अनेक प्रमुख संस्थाओं और संपत्तियों के संचालन में इस्लाम पठान की महत्वपूर्ण भूमिका है। वे विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और समाजहित के मुद्दों पर हमेशा अग्रणी रहते हैं। लोगों का कहना है कि पिता अब्दुल रहमान ने जो विश्वास कमाया था, उसी विश्वास की पूंजी को इस्लाम पठान ने सेवा, सद्भाव और सक्रियता से और मजबूत बनाया है।
गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत मिसाल
मीरा बाई की जन्मस्थली मेड़ता सदियों से सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल रही है। एक ओर श्रद्धा का केंद्र चारभुजा नाथ मंदिर है तो दूसरी ओर ऐतिहासिक जामा मस्जिद अपनी अलग पहचान रखती है। इसी गंगा-जमुनी संस्कृति के बीच अब्दुल रहमान पठान का परिवार भी एक सेतु बनकर उभरा।
पिदन मशीन की धूं-धूं से शुरू हुई यह कहानी आज सिर्फ एक कारोबारी परिवार की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि मेहनत, विश्वास, सामाजिक समरसता और जनसेवा की ऐसी मिसाल है, जिसे मेड़ता लंबे समय तक याद रखेगा। और जब भी गांच्छा बाजार की पुरानी यादें ताजा होंगी, लोग उस धूं-धूं की आवाज के साथ एक नाम जरूर याद करेंगे—अब्दुल इस्लाम पठान।


Author: aapnocitynews@gmai.com



