
🖋 तेजाराम लाडणवा
गोवर्धन (मथुरा)। भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली गोवर्धन की छोटी परिक्रमा मार्ग पर स्थित प्रजापति धर्मशाला आज समाज से एक सवाल पूछ रही है—क्या हम अपनी इस अमूल्य धरोहर को फिर से गौरवशाली बना पाएंगे?
लगभग 350 गज भूमि पर स्थित यह धर्मशाला केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि समाज के पूर्वजों की दूरदर्शिता, त्याग और समाजसेवा की जीवंत निशानी है। करीब 80-90 वर्ष पहले समाज के एक महान दानवीर ने अपनी निजी संपत्ति समाज के नाम समर्पित कर दी थी ताकि आने वाली पीढ़ियां इसका लाभ उठा सकें। आज उसी दान की भूमि करोड़ों रुपये मूल्य की संपत्ति बन चुकी है।
लेकिन विडंबना यह है कि जहां एक ओर देशभर में समाज अपने भवनों और धर्मशालाओं को आधुनिक स्वरूप दे रहा है, वहीं गोवर्धन की यह ऐतिहासिक धर्मशाला समय के थपेड़ों से जूझ रही है। भवन पर आज भी “प्रजापति धर्मशाला” का बोर्ड लगा है, लेकिन इसकी जर्जर स्थिति समाज को आत्ममंथन करने के लिए मजबूर करती है।
यह केवल धर्मशाला नहीं, समाज का भविष्य है
सोचिए…
यदि इसी स्थान पर एक भव्य पांच मंजिला आधुनिक धर्मशाला खड़ी हो जाए…
देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सैकड़ों लोगों के ठहरने की व्यवस्था हो।
विद्यार्थियों के लिए छात्रावास और पुस्तकालय बने।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए अध्ययन केंद्र बने।
समाज के विवाह, सम्मेलन और सामाजिक कार्यक्रम यहां आयोजित हों।
वृद्धजनों, यात्रियों और जरूरतमंदों के लिए सेवा केंद्र संचालित हों।
गोवर्धन परिक्रमा करने आने वाले समाजबंधुओं को सम्मानपूर्वक आवास मिले।
तो यह केवल भवन नहीं रहेगा, बल्कि समाज की पहचान और गौरव का राष्ट्रीय केंद्र बन जाएगा।
पूर्वजों ने विरासत दी, अब जिम्मेदारी हमारी है
जिस व्यक्ति ने यह भूमि समाज को दान दी थी, उसने कभी नहीं सोचा होगा कि भविष्य में इसकी कीमत करोड़ों रुपये होगी। उसने केवल समाज के उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा था।
आज वह सपना अधूरा दिखाई देता है।
समाज के भामाशाह, उद्योगपति, जनप्रतिनिधि, अधिकारी, प्रवासी समाजबंधु और युवा यदि एक मंच पर आ जाएं तो कुछ वर्षों में यहां ऐसा भव्य परिसर बन सकता है जो पूरे देश में प्रजापति समाज की पहचान बन जाए।
गोवर्धन में समाज का अपना तीर्थ बन सकता है
देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु गोवर्धन परिक्रमा करने आते हैं। यदि यहां आधुनिक सुविधाओं से युक्त धर्मशाला का निर्माण हो जाए तो यह स्थान राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात और अन्य राज्यों से आने वाले प्रजापति समाज के लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकता है।
समय की मांग है—एकता, संकल्प और निर्माण
आज आवश्यकता किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे समाज की है।
एक ईंट कोई लगाए, एक कमरा कोई बनवाए, एक मंजिल कोई दान दे, कोई फर्नीचर उपलब्ध कराए, कोई पानी की व्यवस्था करे, कोई पुस्तकालय बनवाए—तो यह सपना बहुत जल्दी साकार हो सकता है।
यदि समाज आज जाग गया तो आने वाली पीढ़ियां गर्व से कहेंगी कि हमारे पूर्वजों ने केवल धर्मशाला नहीं बनाई, बल्कि समाज की पहचान और सेवा का एक ऐसा केंद्र बनाया जो सदियों तक मानवता की सेवा करता रहेगा।
आइए संकल्प लें—
गोवर्धन की प्रजापति धर्मशाला को फिर से गौरवशाली बनाएंगे। पूर्वजों की अमानत को संवारेंगे। समाज को एक नई पहचान देंगे। और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसी धरोहर छोड़ेंगे, जिस पर पूरा प्रजापति समाज गर्व कर सके।
“धर्मशाला का पुनर्निर्माण केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि समाज के स्वाभिमान, एकता और भविष्य का निर्माण है।”


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