
फुलेरा (दामोदर कुमावत): कहने को तो फुलेरा ‘रेलनगरी’ है, लेकिन यहाँ की सड़कों पर सफर करने वालों की किस्मत आज भी पटरी से उतरी हुई है। तीन दशक से ज्यादा का समय बीत गया, दो-दो बार बस स्टैंड के भवन बने, लाखों रुपये खर्च हुए, लेकिन नतीजा ‘सिफर’ है।

आज भी 38 हजार की आबादी वाली इस नगरी के यात्री धूल और असुरक्षा के बीच सड़क किनारे बसें पकड़ने को मजबूर हैं। 1991 का ‘भूतिया’ भवन: न्यू कॉलोनी में 10 लाख की लागत से बना पहला स्टैंड महज एक साल में बंद हो गया। आज भी वह निर्मित बस स्टैंड यहां पर असामाजिक तत्वों का शरण स्थल बना हुआ है। जबकि वर्ष 2023 की नई उम्मीद पर ‘ताला’: पुराना बोलोरो चार बत्ती चौराहा देवयानी नगर में 50 लाख रुपये खर्च कर नया स्टैंड कार्यालय निर्माण किया गया,

लेकिन रोडवेज डिपो की एन ओसी (NOC) न मिलने से यह डेढ़ साल से सफेद हाथी बना खड़ा है। अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जान जोखिम में, सुविधाओं का अभाव
फिलहाल जयपुर, नागौर और डीडवाना डिपो की करीब 20 बसें फुलेरा से गुजरती हैं, लेकिन ठहराव का कोई तय ठिकाना नहीं है। परशुराम और ज्योतिबा फुले सर्किल पर यात्री जान जोखिम में डालकर चलती बस में चढ़ते हैं। यात्रियों को यह तक पता नहीं होता कि अगली बस कब आएगी। घंटों इंतजार और अनिश्चितता ही फुलेरा की पहचान बन गई है।
बड़ा सवाल: बजट 2025 से भी निराशा,विधानसभा में गूँज और जनता की चीख-पुकार के बावजूद बजट 2025 में कोई ठोस घोषणा न होने से कस्बे में भारी रोष है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भवन तैयार है, तो बसों का निश्चित ठिकाने ठहराव क्यों नहीं हो रहा?
“क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? नया बस स्टैंड शुरू हो तो न केवल यात्रियों को सुरक्षा मिलेगी, बल्कि स्थानीय व्यापार और रोजगार को भी पंख लगेंगे।”यह आमजन की आवाज है।

Author: Aapno City News




