
मेड़ता पहुंचे संतों का युवाओं को संदेश — माता-पिता और भगवान से जुड़ाव ही भारतीय संस्कृति की असली शक्ति


🖊 तेजाराम लाडणवा
मेड़ता सिटी की आध्यात्मिक धरा पर शुक्रवार को भक्ति, संस्कार और सनातन संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला। मध्य प्रदेश के देवास जिला के परशुराम मंदिर तुर्नाल से संतों की एक टोली संत श्री ईश्वर दास जोशी के सान्निध्य में मेड़ता पहुंची, जहां संतों ने चारभुजानाथ मंदिर एवं मीराबाई मंदिर में दर्शन कर धर्म, संस्कृति और मानव कल्याण की कामना की।
मंदिर परिसर में संतों ने उपस्थित श्रद्धालुओं, युवाओं और शहरवासियों को संबोधित करते हुए “माता-पिता की जय बोलेंगे” का संदेश दिया। संतों ने कहा कि जिस घर में माता-पिता का सम्मान होता है, वहीं भगवान का वास होता है। माता-पिता ही मनुष्य के प्रत्यक्ष भगवान हैं और उनकी सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है।
संत श्री ईश्वर दास जोशी ने आधुनिक समय की बदलती जीवनशैली पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज मोबाइल और कम्प्यूटर लगातार अपडेट हो रहे हैं, लेकिन इंसान अपने संस्कारों से दूर होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कम्प्यूटर को वायरस से बचाने के लिए एंटी-वायरस जरूरी होता है, उसी प्रकार मानव जीवन को नकारात्मक सोच से बचाने के लिए अच्छे संस्कार आवश्यक हैं।
उन्होंने संस्कार निर्माण एवं सेवा संस्थान द्वारा चलाए जा रहे “मानव सोच शुद्धिकरण” अभियान की सराहना करते हुए कहा कि नई पीढ़ी को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परिवारिक मूल्यों की शिक्षा भी मिलनी चाहिए।
“जिस दिन मंदिरों से इंसानों की आवाज खत्म होगी, संस्कार भी खत्म हो जाएंगे”
संतों ने कहा — तकनीक सुविधा दे सकती है, लेकिन श्रद्धा और भक्ति नहीं
संतों ने मंदिरों में मशीनों के माध्यम से होने वाली आरती और रिकॉर्डेड ढोल-नगाड़ों को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि तकनीक सुविधा का माध्यम हो सकती है, लेकिन भक्ति और श्रद्धा का स्थान कभी नहीं ले सकती।
संत श्री ईश्वर दास जोशी ने कहा, “भगवान ने हमें शरीर, हाथ और भावनाएं इसलिए दी हैं ताकि हम स्वयं अपने इष्टदेव की सेवा करें। अगर मंदिरों में आरती भी मशीनों से होने लगेगी तो आने वाली पीढ़ियां भक्ति और संस्कारों से दूर हो जाएंगी। मशीनें आरती कर सकती हैं, लेकिन भक्ति नहीं।”
उन्होंने युवाओं से कहा कि सोशल मीडिया और मोबाइल जीवन का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन जीवन का आधार माता-पिता, गुरु और संस्कार ही होने चाहिए। “आज की पीढ़ी ऑनलाइन तो बहुत है, लेकिन भगवान और परिवार से उसका जुड़ाव कमजोर होता जा रहा है। यही समय है जब युवाओं को अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा।”
संतों ने कहा कि मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं बल्कि संस्कारों की पाठशाला हैं। यहां से ही अनुशासन, सेवा, सम्मान और मानवता की शिक्षा मिलती है।
इस दौरान संतों ने मातृकुण्डिया त्रिवेणी संगम एवं माँ बनास नदी की महिमा का भी वर्णन किया। भगवान परशुराम भगवान की कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि माता-पिता की आज्ञा, तपस्या और धर्म के मार्ग पर चलना ही मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।
संतों ने कहा कि मातृकुण्डिया वह पवित्र स्थान है जहां भगवान परशुराम को मातृ हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। आज भी हजारों श्रद्धालु वहां स्नान, पितरों के तर्पण और त्रिवेणी परिक्रमा कर आत्मशुद्धि का अनुभव करते हैं।
कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने “माता-पिता की जय बोलेंगे” का सामूहिक उद्घोष किया। मंदिर परिसर भक्ति, संस्कार और आध्यात्मिक ऊर्जा से गूंज उठा। उपस्थित युवाओं ने भी भारतीय संस्कृति, माता-पिता सम्मान और सनातन परंपराओं को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

Author: aapnocitynews@gmai.com




