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68 वर्ष की उम्र में भी की-पैड फोन से रोजाना जन्मदिन–विवाह सालगिरह की बधाई… समय, सेवा और स्नेह का दुर्लभ संगम

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मेड़ता के ‘टाइममैन’: 46 साल से रिश्तों को समय पर निभाने वाला अद्भुत इंसान

मेड़ता सिटी (तेजाराम लाडणवा)

भागदौड़ और डिजिटल दुनिया के इस तेज़ दौर में जहां रिश्तों की गर्माहट चैट, स्टिकर्स और स्टेटस में सिमट गई है, वहीं शहर के 68 वर्षीय सीताराम बजाज आज भी रिश्तों को निभाने का अपना अनोखा, अनुशासित और बेहद मानवीय अंदाज़ बरकरार रखे हुए हैं। यही वजह है कि लोग उन्हें प्यार से ‘टाइममैन’ कहते हैं। पिछले 46 वर्षों से वे बिना एक भी दिन चूके अपने परिचितों और सामाजिक संपर्क में आने वाले लोगों को जन्मदिन, सालगिरह और विशेष मौकों पर समय से फोन कर शुभकामनाएं देना नहीं भूलते।
समय की इतनी पाबंदी कि घड़ी भी शर्मा जाए
बजाज हर दिन सुबह 10 से 11 बजे के बीच चतुर्भुजनाथ मंदिर के अपने निर्धारित स्थान पर बैठते हैं। उनके चेहरे की सादगी और जीवनशैली का अनुशासन मेड़ता शहर की पहचान बन चुका है। आसपास के दुकानदार कहते हैं—“समय चाहे कैसा भी हो, जगह वही, भाव वही और फोन वही पुराना की-पैड वाला।” यही निरंतरता उन्हें आम से खास बनाती है।
इस दौर में जहां लोग बधाई देना भले भूल जाएं लेकिन शाम को सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर औपचारिकता निभा लेते हैं, वहीं बजाज अपनी डायरी के पन्ने पलटकर हर व्यक्ति को याद करते हैं। उनके फोन पर आने वाली ‘थैंक्यू’ की आवाज़ उनके लिए दुनिया की सबसे बड़ी कमाई है।
सिर्फ रिश्ते ही नहीं, सेवा और भक्ति भी
बजाज चतुर्भुजनाथ मंदिर के अनन्य भक्त हैं और लंबे समय से मंदिर और समाज से जुड़ी सेवाओं में सक्रिय हैं। लगभग 28 वर्ष पहले उन्होंने मुंबई में मेड़ता तहसील माहेश्वरी परिषद का गठन कराया था, जो प्रवासी परिवारों को जोड़ने और मरीजों को निःशुल्क दवाएं उपलब्ध करवाने जैसे नेक काम आज भी कर रही है।
जन समस्याओं के समाधान में भी रहे अग्रणी
समय-समय पर सामाजिक मुद्दों और प्रशासनिक स्तर पर कई जन समस्याओं के समाधान में भी बजाज आगे रहे हैं। शहर और समाज से जुड़ी जटिल समस्याओं को बिना किसी स्वार्थ और अपेक्षा के स्वर देने की यह परंपरा उन्हें अलग श्रेणी में खड़ा करती है।
रिश्तों की असल पूंजी — ‘याद रखना’
इस आधुनिक समय में जहां रिश्तों की सबसे बड़ी दिक्कत ‘समय की कमी’ बताई जाती है, वहीं बजाज का संदेश बिल्कुल उलट है—
“संबंध पैसों से नहीं, समय और स्मरण से चलने वाली पूंजी हैं।”
आज सोशल मीडिया पर लोग जन्मदिन पर सैकड़ों बधाइयां पा लेते हैं, पर दिल से की गई एक कॉल अभी भी मन को छू जाती है। सीताराम बजाज इसी खोई हुई मानवीय संवेदना के प्रतिनिधि हैं।

बजाज का यह जुनून, सेवा और अनुशासन अब मेड़ता की पहचान बन चुका है। कई लोग कहते हैं—“जन्मदिन या सालगिरह की सबसे पहले बधाई अगर कहीं से आती है तो बजाज जी से ही आती है।”

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