

नागौर | एक्सक्लूसिव
मेड़ता उपखंड के डांगावास में 23 दिसंबर को आयोजित होने वाला राज्य स्तरीय किसान सम्मेलन अब केवल विकास कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि यह सरकार और विपक्ष के बीच सीधी राजनीतिक जंग का मैदान बनता नजर आ रहा है। जहां विपक्ष सरकार पर किसान विरोधी नीतियों के आरोप लगा रहा है, वहीं भजनलाल सरकार हजारों करोड़ की योजनाओं के ऐलान के जरिए आक्रामक पलटवार की तैयारी में है।
विपक्ष का आरोप: घोषणाएं सिर्फ चुनावी जुमला_
विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार किसानों की समस्याओं—एमएसपी की कानूनी गारंटी, सिंचाई संकट, बढ़ती लागत और कर्ज—पर ठोस समाधान देने में विफल रही है। विपक्ष इसे “इवेंट आधारित राजनीति” करार दे रहा है और दावा कर रहा है कि घोषणाएं ज़मीन पर कम और मंचों पर ज़्यादा दिखाई देती हैं।
सरकार का जवाब: सीधे खाते में पैसा, सड़क और घर
सरकार विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कह रही है कि
1,200 करोड़ रुपये का सीधा हस्तांतरण
2 हजार करोड़ से अधिक की सड़क परियोजनाएं
कृषि, पशुपालन और आवास योजनाओं का वास्तविक लाभ
यह सब कागज नहीं, बैंक खाते और ज़मीन पर दिखने वाला विकास है।
केंद्र-राज्य की जोड़ी बनाम विपक्ष की रणनीति
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी से सरकार यह संदेश देना चाहती है कि किसान नीति पर दिल्ली और जयपुर एक पंक्ति में खड़े हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विपक्ष के उस आरोप को कमजोर करता है, जिसमें केंद्र-राज्य तालमेल की कमी की बात कही जाती रही है।
किसान आंदोलन बनाम किसान सम्मेलन
विपक्ष जहां किसान आंदोलनों को सरकार के खिलाफ हथियार बना रहा है, वहीं सरकार किसान सम्मेलन के जरिए ‘संवाद और समाधान’ की राजनीति कर रही है। डांगावास सम्मेलन को इसी रणनीति का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।
नागौर से मारवाड़ तक संदेश
नागौर जिला किसान राजनीति का संवेदनशील केंद्र रहा है। ऐसे में यहीं से सरकार का बड़ा आयोजन विपक्ष के लिए राजनीतिक चुनौती बनता दिख रहा है। सम्मेलन का असर केवल नागौर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे मारवाड़ में सियासी तापमान बढ़ाने वाला माना जा रहा है।
आगे की लड़ाई: घोषणाएं बनाम ज़मीनी हकीकत
अब असली परीक्षा डांगावास के बाद शुरू होगी। विपक्ष इन घोषणाओं की क्रियान्विति पर नजर रखेगा, जबकि सरकार इन्हें अपनी उपलब्धि बनाकर गांव-गांव तक पहुंचाने की तैयारी में है।



Author: aapnocitynews@gmai.com





