
भवसागर से पार उतारने वाली रामकथा का रसपान।
फुलेरा (दामोदर कुमावत)
सियाराम बाबा की बगीची स्थित हर सिद्ध हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रहे श्री सीताराम विवाह महोत्सव एवं श्रीराम कथा आनन्दोत्सव में शनिवार को सम्पूर्ण वातावरण राममय हो उठा।

वृन्दावन धाम के ख्यातिलब्ध कथा वाचक महंत श्री रामकल्याण दास महाराज ने अपने मधुर कंठ से श्रीराम जन्मोत्सव एवं बाल लीला का ऐसा जीवंत वर्णन किया कि सैकड़ों श्रद्धालु आँसुओं से मंगल हो उठे और बार-बार “जय श्रीराम… जय सियाराम” के जयघोष से पूरा पांडाल गुंजायमान हो उठा।

भगवान श्रीराम के अवतरण का वह पावन क्षण जब महाराज जी ने कहा, “आज चैत्र शुक्ल नवमी को कौशल्या के गर्भ से स्वयं नारायण ने राम रूप में जन्म लिया…” तो उपस्थित सभी भक्तों के रोंगटे खड़े हो गए। इसके बाद नन्हें राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की मनमोहक बाल लीलाओं की जीवंत झांकियाँ सजाई गईं। छोटे-छोटे बाल कलाकारों ने जिस सहजता से राम-लक्ष्मण का धनुष-बाण तोड़ना, विश्वामित्र यज्ञ की रक्षा और ताड़का वध जैसी लीलाओं का अभिनय किया, इस कथा भक्तजन गद्गद् हो उठे।

कोई माता कौशल्या बनकर लोरी सुना रही थीं, तो कोई दशरथ महाराज नन्हें राम को गोद में लेकर दुलार कर रहे थे – ऐसा लगा मानो अयोध्या धरती पर अवतरित हो गई हो।व्यासपीठ से श्री राम कल्याण महाराज ने मार्मिक स्वर में कहा –“हे प्रभु प्रेमियों! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है,तब-तब भगवान स्वयं अवतार लेकर धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं। श्रीराम का अवतार केवल राजा बनने के लिए नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर हमें सत्य, धर्म और प्रेम का पाठ पढ़ाने के लिए हुआ है।

जो प्राणी सच्चे मन से रामकथा श्रवण करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो भवसागर पार कर लेता है।”
कथा को संगीतमय बनाने में तबला पर मंगलदीप, हारमोनियम पर वृन्दावन दास, ऑर्गन पर अटल कार्तिक ने जो सुर लहरियाँ छेड़ीं, उससे पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। झांकियों की भव्य सजावट शिवम पाठक व सच्चिदानंद ने की। आचार्य आगमन शुक्ला जी ने पूजन-अर्चन करवाया।
सांयकाल में तो और भी दिव्य दृश्य देखने को मिला। मुख्य यजमान श्रीमती गायत्री देवी पत्नी शंकर लाल कुमावत
(माता कौशल्या व जनक भूमिका में) के यहाँ कथा स्थल से गाजे-बाजे, ढोल-नगाड़ों और लवाजमे के साथ लग्न-पत्रिका लेकर बारात की तरह पूरा जुलूस पहुँचा। पूरा कस्बा राममयी बयार में डूब गया। महंत श्री 1008 त्रिलोकी दास जी महाराज ने कहा,“आओ, प्रभु के रंग में रंग जाएँ… यह कथा केवल सुनने की नहीं, जीने की वस्तु है।” संत श्री 1008 बृजभूषण दास जी महाराज (मोनी बाबा) के सान्निध्य में चल रहे इस महोत्सव में अभी श्रीराम वनगमन, सीताहरण, हनुमान मिलन और अंत में सीताराम विवाह तक की लीलाएँ बाकी हैं।जय सियाराम! यह कथा नहीं, प्रभु का साक्षात् दर्शन है। जो कोई भी इस पावन आनंद से वंचित है, वह शीघ्र पधारें और अपने जीवन को धन्य करें।

Author: aapnocitynews@gmai.com




