
🖊 तेजाराम लाडणवा
एक बेटी की शादी जीवन का सबसे सुखद पड़ाव होती है, लेकिन जब उस पल पिता का साया साथ न हो तो खुशियों के बीच एक खालीपन भी गूंजता है। मेड़ता उपखंड की ग्राम पंचायत कड़वासरों की ढाणी में शनिवार को ऐसा ही भावनात्मक दृश्य देखने को मिला, जिसने हर आंख को नम और हर दिल को गर्व से भर दिया।
शहीद भागीरथ कड़वासरा, जिन्होंने वर्ष 2002 में असम के मिलनपुर में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए मातृभूमि पर प्राण न्यौछावर कर दिए थे, उनकी पुत्री सुष्मिता के विवाह में उनके सैन्य साथी मेहमान बनकर नहीं, बल्कि ‘पिता’ बनकर पहुंचे। भारतीय सेना की 13 ग्रेनेडियर्स बटालियन (गंगानगर–जैसलमेर सेक्टर) के 24 जवान पूरे सैन्य सम्मान और आत्मीयता के साथ विवाह समारोह में शामिल हुए।
वर्दी में निभाया वर्षों पुराना वादा
कमान अधिकारी कर्नल सोमेन्द्र कुमार के नेतृत्व में आए जवानों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार सभी रस्में निभाईं। सेवानिवृत्त कर्नल सुरेशचंद्र राणा सहित अन्य अधिकारियों की उपस्थिति ने माहौल को और गरिमामय बना दिया। बारात के स्वागत से लेकर कन्यादान जैसी भावनात्मक रस्मों तक, हर कदम पर जवानों ने यह साबित किया कि साथी भले दुनिया छोड़ जाए, दोस्ती और फर्ज नहीं मरते।
विदाई के समय जब जवानों ने सुष्मिता के सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया, तो वहां मौजूद ग्रामीण, परिजन और खुद सैनिकों की आंखें छलक उठीं। गांव के बुजुर्गों का कहना था—
“आज के दौर में लोग जिम्मेदारियों से किनारा कर लेते हैं, लेकिन सेना के जवानों ने शहीद साथी के परिवार के प्रति जो आत्मीयता दिखाई, वह समाज के लिए अनुकरणीय उदाहरण है।”
शौर्य की गाथा
10 जनवरी 1978 को कड़वासरों की ढाणी में जन्मे भागीरथ कड़वासरा वर्ष 1995 में 13 ग्रेनेडियर्स में भर्ती हुए थे। 8 जून 2002 को असम में आतंकवादियों के खिलाफ अभियान के दौरान उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए वीरगति पाई। उनकी वीरता के लिए 26 मार्च 2003 को भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से अलंकृत किया।
उनके पीछे पत्नी संतोष देवी और एकमात्र पुत्री सुष्मिता हैं। अब वही बेटी जीवन के नए सफर पर डांगावास निवासी प्रशांत जाखड़ के साथ अग्रसर हुई है—और इस सफर की शुरुआत में पिता की कमी को उनके सैनिक साथियों ने अपने स्नेह से भर दिया।
समाज के लिए संदेश
इस मार्मिक क्षण ने यह संदेश दिया कि
“मित्र दोष नहीं देखते, मित्र फर्ज निभाते हैं।
साथी चला जाए तो क्या, उसका परिवार हमारा है।”
शहीद के पिता हप्पाराम, भाई संजय कड़वासरा सहित परिवारजनों ने सैन्य जवानों का आभार जताया। ग्रामीणों ने कहा कि यह दृश्य केवल एक विवाह समारोह नहीं, बल्कि भारतीय सेना की उस परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जहां साथ, सम्मान और संवेदना सबसे ऊपर हैं।
यही है भारतीय सेना की खासियत
यह घटना हर उस बेटी के लिए प्रेरणा है, जिसके सिर से पिता का साया उठ चुका है—कि समाज में ऐसे कंधे आज भी मौजूद हैं जो जरूरत पड़ने पर पिता बनकर खड़े हो जाते हैं।



Author: aapnocitynews@gmai.com




