[darkmysite switch="1" width_height="45px" border_radius="30px" icon_width="20px" light_mode_bg="#121116" dark_mode_bg="#ffffff" light_mode_icon_color="#ffffff" dark_mode_icon_color="#121116"]

दहेज़ मुक्त विवाह में सबसे पहले माता-पिता का सम्मान होतभी बदलेगी सोच, तभी जड़ से खत्म होगी कुरीति

SHARE:


🖊तेजाराम लाडणवा
दहेज़ प्रथा के खिलाफ खड़े होने वाले परिवारों में सबसे बड़ा साहस माता-पिता दिखाते हैं। इसलिए समाज को चाहिए कि दहेज़ मुक्त विवाह करने वाले दूल्हा-दुल्हन से पहले उनके माता-पिता का सार्वजनिक सम्मान किया जाए।
जब किसी बेटी या बेटे के माता-पिता को मंच पर बुलाकर शॉल, साफा या प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाएगा, तब यह संदेश दूर-दूर तक जाएगा कि असली आदर्श वही हैं जो अपने घर से सुधार की शुरुआत करते हैं।
माता-पिता का सम्मान, बेटी का सम्मान
यदि माता-पिता का सम्मान होगा तो वे बहू को भी कलेजे से लगाकर बेटी के समान अपनाएंगे। दहेज़ मुक्त विवाह केवल लेन-देन का त्याग नहीं, बल्कि रिश्तों को सच्चे स्नेह और समानता के आधार पर स्वीकार करना है।
समाज में यह परंपरा विकसित हो कि—
पहले दूल्हे और दुल्हन के माता-पिता का सम्मान हो।
उसके बाद दूल्हा-दुल्हन को आदर्श दंपति के रूप में सम्मानित किया जाए।
युवाओं में बढ़ेगा सकारात्मक लगाव
जब युवा देखेंगे कि दहेज़ छोड़ने पर परिवार को सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है, तो उनमें भी इस दिशा में आगे बढ़ने का उत्साह पैदा होगा। सम्मान और सामाजिक स्वीकृति सबसे बड़ा प्रोत्साहन है।
जरूरत है कि समाज केवल भाषण न दे, बल्कि अपने घर से इस बदलाव को लागू करे। जो लोग दहेज़ प्रथा का विरोध करते हैं, वे स्वयं उदाहरण बनें और दूसरों को भी प्रेरित करें।
यदि समाज ने यह ठान लिया कि दहेज़ लेने वालों के बजाय दहेज़ छोड़ने वालों का सम्मान होगा, तो आने वाले समय में यह कुरीति स्वतः समाप्त होने लगेगी।

Join us on:

Leave a Comment

सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली खबर

शहर चुनें

Follow Us Now

Follow Us Now