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विकलांगता एक शारीरिक स्थिति हो सकती है, लेकिन हिम्मत और आत्मबल से बड़ी कोई शक्ति नहीं होती।”

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हौसलों की उड़ान: करमा राम डांगा की प्रेरक जीवन यात्रा


गांव डांगावास, जिला नागौर (राजस्थान) – इस छोटे से गांव में जन्मे एक असाधारण व्यक्तित्व ने अपने बुलंद हौसलों से यह सिद्ध कर दिया कि “शरीर भले ही कमजोर हो, पर यदि आत्मा में आग हो तो कोई भी राह मुश्किल नहीं होती।”

करमा राम डांगा का जन्म श्री पुरखाराम डांगा और श्रीमती छोटी देवी के घर एक साधारण ग्रामीण परिवेश में हुआ था। वे अपने माता-पिता के प्रथम पुत्र थे, जिससे परिवार में अत्यंत उत्साह था, परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था।

केवल दो वर्ष की उम्र में उन्हें पोलियो या किसी अज्ञात बीमारी ने जकड़ लिया, जिससे उनके दोनों पैर चलने-फिरने में असमर्थ हो गए। यह खबर जैसे पूरे परिवार पर बिजली बनकर गिरी। माता-पिता का सपना, जो पहली संतान के साथ ऊंचाइयों को छूने का था, पलभर में टूटता नजर आया।

लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई… यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा सफर जो हजारों-लाखों के लिए प्रेरणा बन गया।


करम राम डांगा ने गांव डांगावास के सरकारी विद्यालय में अपनी शिक्षा की शुरुआत की। हालांकि पैरों ने उनका साथ छोड़ दिया था, लेकिन हौसलों ने कभी नहीं।

हर दिन 3 किलोमीटर की दूरी — वह भी बिना किसी आधुनिक सुविधा के — केवल लकड़ी से बनी घोड़ी के सहारे तय करना… किसी के लिए नामुमकिन लगता है, लेकिन करमा राम डांगा के लिए यह जीवन की राह का हिस्सा बन गया।

प्राथमिक शिक्षा के बाद उन्होंने मेड़ता कॉलेज से अपनी उच्च शिक्षा पूर्ण की। शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक और मानसिक रूप से भी खुद को मजबूत बनाया।


अपनी मेहनत और लगन के बल पर करम राम डांगा ने मेड़ता सिटी पंचायत समिति की चुनाव शाखा में सेवा देना प्रारंभ किया।

शुरुआत में, उन्हें डांगावास गांव से मेड़ता सिटी की चुनाव शाखा तक 3 किलोमीटर की दूरी लकड़ी की घोड़ी से तय करनी पड़ती थी। यह कार्य आसान नहीं था — बारिश, गर्मी, सर्दी — कोई भी मौसम उनके इरादों को डिगा नहीं सका।

आज वही करम राम डांगा अपने निजी वाहन से कार्यालय आते-जाते हैं। यह बदलाव केवल साधनों का नहीं, उनके जीवन संघर्ष की जीत का प्रतीक है।


करमा राम डांगा केवल नौकरी तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने सामाजिक और संगठनात्मक कार्यों में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में वे एक संगठन में प्रदेश उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं और समाज में जागरूकता और सेवा का संदेश फैला रहे हैं।


उनकी सेवाओं और योगदान को देखते हुए उपखंड और जिला स्तर पर उन्हें कई बार सम्मानित किया गया है। यह उनके समर्पण, ईमानदारी और कर्मठता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।


उनकी कहानी हर उस व्यक्ति के लिए रोशनी की किरण है, जो जीवन की कठिनाइयों से हार मान बैठता है। उन्होंने यह साबित किया कि:


आज करमा राम डांगा जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, वह हर युवा, हर माता-पिता और हर समाज के लिए सीख है। उनका जीवन इस बात का प्रतीक है कि जब इरादे मजबूत हों, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।


“जिनके इरादों में जान होती है,
उनकी राहों में ही पहचान होती है।
चल कर दिखा दिया उन्होंने वहां,
जहां उम्मीद भी थम सी जाती है।”


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